तुम्हारी माहवारी

तुम्हारी माहवारी


तुम्हारी माहवारी
नहीं कोई बीमारी
 प्रकृति की तैयारी
 परिपक्व जिम्मेदारी
 नया बुनने को
 मोहक सपने गुंथने को
 समझो मत तुम इसे पाप
 क्रिया ये सहज आप
 इससे बनती तुम अछूत
 कहते जो हैं निरे धूर्त
 साफ-सफाई का रखना ध्यान
 विज्ञान से लेना पूरा ज्ञान

 गंदा कपड़ा मत करना उपयोग
 इससे हो सकता है रोग
 गर समाज न हो लाचार
 क्यों हो कोई अत्याचार
 'अरुणाचलम' के संघर्ष से
 सतत् सघन उत्कर्ष से
 हुआ प्रेरित
 लिखा कवित्त
 समझ न आता...
 थे क्यों अब तक मौन
 सीधी सच्ची बात बताता...
 अपना ये 'पैडमैन

-आशुतोष झा

Comments

  1. मित्रों,
    प्रकृति संपूर्णता में शुभ्र है। कुछ भी गंदा असुचिकर नहीं।
    सार्थक होइए।✨��

    ReplyDelete
  2. One of my favourite lines I had ever read.

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

लोग क्या कहेंगे ...Log kya kahenge

भय

खता