लोग क्या कहेंगे नजरें बचाकर करो यह काम नहीं तो लोग क्या कहेंगे अपनी उत्कंठाएं छुपा के व्यक्त करना हो गए बच्चे बड़े बुद्धि से काम लेना नहीं तो लोग क्या कहेंगे धर्म के नाम पर दिया इतना कम चंदा यहीं पड़ा रह जाएगा माल-धंधा यही दान ही तो ऊपर जाएगा आपको शोहरत दिलाएगा सारे काम बनाएगा थी जेब ढीली थी हालत पतली लेकिन नहीं दिया तो लोग क्या कहेंगे बच्चे को कुछ और है बनना है पिता को पड़ोसी से लड़ना हम किसी से कम हैं क्या बच्चे को टाइट करेंगे उसका टाइम राइट करेंगे हम भी आदर्श पिता हैं सबको यह पता है यह तो हमें करना है नहीं तो लोग क्या कहेंगे हमसे भी ज्यादा कोई निर्धन है हमारे पास ज़रा-सा धन है हमारी ही कोई मदद कर दे हम कैसे किसी की मदद करें ऐसे थोड़े ही होता है ऐसा करेंगे तो लोग क्या कहेंगे... बेटा बाएं हाथ से पैसा नहीं लेते-देते हैं सूंघ कर धूप नहीं खरीदते हैं हर दिन दाढ़ी नहीं बनवाना मूंछ तभी हटाते हैं जब पिता गुज़र जाते हैं मुर्दे को देख लिया अब पड़ेगा नहाना मंदिर के बाहर गाली तो चलता है वहां...
एक कविता जो भय के तिलिस्म को समझने में मदद करती है।
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