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भय

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न भाग किसी भय से पगले की बनाया उसे तूने ही तो है भला बाप भी बेटे से डरकर कभी भागा है। ठठा रह न, गर कोई ठठा कर हंसे। देखना हर अहले दम, तू न फंसे। .................. आशुतोष झा ।     

खता

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हम मसरूफ़ हैं हमें पता है हम मजबूर हैं हमें पता है लेकिन, इतना पूछना है आपसे इसमें बेचारे दिल💖की क्या खता है? ... आशुतोष झा

जीवन नहीं मरा करता है...

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कुछ सपनों के बिखराने से कुछ अपनों के खो जाने से जीवन नहीं मरा करता है  नए ज्वार की चाह रखता है। पुष्पित पल्लव झड़ जाने से नयन के आंसू बरसाने से जीवन नहीं मरा करता है नए ज्वार की चाह रखता है। अंतस मांझी ना मिलने पर बुझा दिया ना जलने पर जीवन नहीं मरा करता है नए ज्वार की चाह रखता है। ग़म का आदि हो जाने पर कुछ बर्बादी हो जाने पर जीवन नहीं मरा करता है नए ज्वार की चाह रखता है। हार जीत के दिन हैं चार ऊपर से संताप अपार। इस तंगी में होठों पर हर्ष पंक्ति बिछ जाने पर हर क्षण जीवन जीता है नए ज्वार की चाह रखता है। ... आशुतोष झा

क्या मेरा दर्द तुम समझोगे?

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   क्या मेरा दर्द तुम समझोगे? देखो वह लिटाकर अपने बच्चे को सूटकेस पर... खींच रही है कैसे । सैकड़ों मील कुछ हो ही न उसके लिए जैसे । कितना चलना है पता नहीं । कहां रुकना है पता नहीं  । आखिरी बार कब खाया था याद नहीं । बस इतना याद है कि...  चल रही हूं अपने रास्ते । अपनी जिंदगी के वास्ते । मरने का मुझे शौक नहीं है। भूखे पेट...मेरे लिए डाउन लौक नहीं है। चलूंगी नहीं तो मर जाऊंगी ।  क्या इन सुनसान रास्तों से डर जाउंगी?  अब कुछ भी हो चलना है । कितने भी हो कठिन हालात आगे बढ़ना है । ... आशुतोष झा

तुम्हारी माहवारी

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तुम्हारी माहवारी तुम्हारी माहवारी नहीं कोई बीमारी  प्रकृति की तैयारी  परिपक्व जिम्मेदारी  नया बुनने को  मोहक सपने गुंथने को  समझो मत तुम इसे पाप  क्रिया ये सहज आप  इससे बनती तुम अछूत  कहते जो हैं निरे धूर्त  साफ-सफाई का रखना ध्यान  विज्ञान से लेना पूरा ज्ञान  गंदा कपड़ा मत करना उपयोग  इससे हो सकता है रोग  गर समाज न हो लाचार  क्यों हो कोई अत्याचार  'अरुणाचलम' के संघर्ष से  सतत् सघन उत्कर्ष से  हुआ प्रेरित  लिखा कवित्त  समझ न आता...  थे क्यों अब तक मौन  सीधी सच्ची बात बताता...  अपना ये 'पैडमैन -आशुतोष झा

लोग क्या कहेंगे ...Log kya kahenge

लोग क्या कहेंगे नजरें बचाकर करो यह काम नहीं तो लोग क्या कहेंगे अपनी उत्कंठाएं छुपा के व्यक्त करना हो गए बच्चे बड़े  बुद्धि से काम लेना  नहीं तो लोग क्या कहेंगे धर्म के नाम पर दिया इतना कम चंदा  यहीं पड़ा रह जाएगा माल-धंधा यही दान ही तो ऊपर जाएगा आपको शोहरत दिलाएगा सारे काम बनाएगा  थी जेब ढीली थी हालत पतली लेकिन नहीं दिया तो  लोग क्या कहेंगे  बच्चे को कुछ और है बनना  है पिता को पड़ोसी से लड़ना  हम किसी से कम हैं क्या बच्चे को टाइट करेंगे उसका टाइम राइट करेंगे हम भी आदर्श पिता हैं  सबको यह पता है यह तो हमें करना है नहीं तो लोग क्या कहेंगे हमसे भी ज्यादा कोई निर्धन है हमारे पास ज़रा-सा धन है हमारी ही कोई मदद कर दे हम कैसे किसी की मदद करें ऐसे थोड़े ही होता है ऐसा करेंगे तो लोग क्या कहेंगे... बेटा बाएं हाथ से पैसा नहीं लेते-देते हैं सूंघ कर धूप नहीं खरीदते हैं हर दिन दाढ़ी नहीं बनवाना मूंछ तभी हटाते हैं जब पिता गुज़र जाते हैं मुर्दे को देख लिया अब पड़ेगा नहाना मंदिर के बाहर  गाली तो चलता है वहां...